Tuesday, 12 June 2018

पावस #paavas

जून माह के तीसरे सप्ताह से पावस यानी वर्षा ऋतु का आगमन
हो गया है। आषाढ़ से भादौ मास तक वर्षाकाल माना गया है। धरती की गोद से जब नव अंकुर फूटते हैं तो धरती की हरियाली
चूनर लहरा उठती है। काव्य जगत भी इसकी सुंदरता से अछूता नहीं रह पाया। वसंत ऋतुराज है तो पावस ऋतुओं की रानी।
पावस की बूंदें धरती पर पड़ते ही लोगों के तन-मन फुहारों से सिंचित हो खिल उठते हैं, ताप भाग खड़ा होता है। झुलसे बाग-बगीचों में बहार आ जाती है। घनघोर घटाओं से आकाश घिर जाता है। चारों ओर हरियाली तो नदी, तालाब आदि जल से लबालब हो जाते हैं, किसान प्रफुल्लित हो उठते हैं, ठंडी बयारें, वर्षा का जल नया संदेशा, नई चेतना लेकर आते हैं।आषाढ़ माह शुरू होते ही काले मानसूनी बादलों की गर्जन और दामिनी की आतिशबाजी से आकाश में धमा-चौकड़ी मच जाती है तथा मेघ
समारोह के नजारे होते हैं। सावन-भादौ आते-आते वर्षा ऋतु पूर्ण यौवन को प्राप्त करती है।भादौ की झड़ी तो सावन की रिमझिम मन मस्तिष्क में अंकित होने लगती हैं। आदिकाल से ही ऋतु वर्णन कवियों का प्रिय विषय रहा है। आइये पावस पर विभिन्न कवियों की रचनाओं से परिचय करते हैं।

अमीर खुसरो .....

आ घिर आई दई मारी घटा कारी
आ घिर आई दई मारी घटा कारी।
बन बोलन लागे मोर
दैया री बन बोलन लागे मोर।
रिम-झिम रिम-झिम बरसन लागी छाई
री चहुँ ओर।
आज बन बोलन लागे मोर।
कोयल बोले डार-डार पर पपीहा मचाए शोर।
आज बन बोलन लागे मोर।
ऐसे समय साजन परदेस गए बिरहन छोर।
आज बन बोलन लागे मोर।

नज़ीर अकबराबादी.......

हैं इस हवा में क्या-क्या बरसात की बहारें।
सब्जों की लहलहाहट ,बाग़ात की बहारें।
बूँदों की झमझमाहट, क़तरात की बहारें।
हर बात के तमाशे, हर घात की बहारे।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की
बहारें।
बादल लगा टकोरें , नौबत की गत लगावें।
झींगर झंगार अपनी , सुरनाइयाँ बजावें।
कर शोर मोर बगले , झड़ियों का मुँह बुलावें।
पी -पी करें पपीहे , मेंढक मल्हारें गावें।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की
बहारें।
क्या - क्या रखे हए है या रब सामान तेरी
कुदरत।
बदले है रंग क्या- क्या हर आन तेरी कुदरत।
सब मस्त हो रहे हैं , पहचान तेरी कुदरत।
तीतर पुकारते है , 'सुबहान तेरी कुदरत'।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की
बहारें।
जो मस्त हों उधर के , कर शोर नाचते हैं।
प्यारे का नाम लेकर ,क्या जोर नाचते हैं।
बादल हवा से गिर - गिर, घनघोर नाचते हैं।
मेंढक उछल रहे हैं ,और मोर नाचते हैं।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की
बहारें।
कितनों तो कीचड़ों की, दलदल में फँस रहे हैं।
कपड़े तमाम गंदे , दलदल में बस रहे हैं।
इतने उठे हैं मर - मर, कितने उकस रहे हैं।
वह दुख में फँस रहे हैं, और लोग हँस रहे हैं।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की
बहारें।
यह रुत वह है जिसमें , खुर्दो कबीर खुश हैं।
अदना गरीब मुफ्लिस, शाहो वजीर खुश हैं।
माशूक शादो खुर्रम , आशिक असीर खुश हैं।
जितने हैं अब जहाँ में, सब ऐ 'नज़ीर' खुश हैं।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की
बहारें।

सुमित्रानन्दन पंत....

मुसकाओ हे भीम कृष्ण घन !
गहन भयावह अंधकार को
ज्योति मुग्ध कर चमको कुछ क्षण ।
दिन् विदीर्ण कर, भर गुरु गर्जन,
चीर तड़ित् से अन्ध आवरण,
उमड़ घुमड़, घिर रूम झूम, हे,
बरसाओ नव जीवन के कण !
घूम घूम छा निर्भर अंबर,
झूल झूल झंझा झोकों पर,
हे दुर्दम उद्दाम, हरो
भव ताप, दाप, अभिमत कर सिंचन !
इंद्रचाप से कर दिशि चित्रित
बर्हभार से केकी पुलकित,
हरित भरित हे करो धरणि को
हो करुणार्द्र, घोर वज्र स्वन !

रामधारीसिंह दिनकर....

अम्बर के गृह गान रे, घन-पाहुन आये।
इन्द्रधनुष मेचक-रुचि-हारी,
पीत वर्ण दामिनि-द्युति न्यारी,
प्रिय की छवि पहचान रे, नीलम घन छाये।
वृष्टि-विकल घन का गुरु गर्जन,
बूँद-बूँद में स्वप्न विसर्जन,
वारिद सुकवि समान रे, बरसे कल पाये।
तृण, तरु, लता, कुसुम पर सोई,
बजने लगी सजल सुधि कोई,
सुन-सुन आकुल प्राण रे, लोचन भर आये।

सुर्यकांत त्रिपाठी निराला....

घन,गर्जन से भर दो वन
तरु-तरु-पादप-पादप-तन।
अबतक गुँजन-गुँजन पर
नाचीँ कलियाँ छबि-निर्भर;
भौँरोँ ने मधु पी-पीकर
माना,स्थिर मधु-ऋतु कानन।
गरजो, हे मन्द्र, वज्र-स्वर;
थर्राये भूधर-भूधर,
झरझर झरझर धारा झर
पल्लव-पल्लव पर जीवन।

महादेवी वर्मा.....

कहाँ से आये बादल काले?
कजरारे मतवाले!
शूल भरा जग, धूल भरा नभ,
झुलसीं देख दिशायें निष्प्रभ,
सागर में क्या सो न सके यह
करुणा के रखवाले?
आँसू का तन, विद्युत् का मन,
प्राणों में वरदानों का प्रण,
धीर पदों से छोड़ चले घर,
दुख-पाथेय सँभाले!
लाँघ क्षितिज की अन्तिम दहली,
भेंट ज्वाल की बेला पहली,
जलते पथ को स्नेह पिला
पग पग पर दीपक वाले!
गर्जन में मधु-लय भर बोले,
झंझा पर निधियाँ धर डोले,
आँसू बन उतरे तृण-कण ने
मुस्कानों में पाले!
नामों में बाँधे सब सपने,
रूपों में भर स्पन्दन अपने
रंगों के ताने बाने में
बीते क्षण बुन डाले!
वह जड़ता हीरों से डाली,
यह भरती मोती से
थाली,
नभ कहता नयनों में बस
रज कहती प्राण समा ले

जयशंकर प्रसाद....

नव तमाल श्यामल नीरद माला भली
श्रावण की राका रजनी में घिर
चुकी,
अब उसके कुछ बचे अंश आकाश में
भूले भटके पथिक सदृश हैं घूमते।
अर्ध रात्री में खिली हुई
थी मालती,
उस पर से जो विछल पड़ा था, वह चपल
मलयानिल भी अस्त व्यस्त हैं घूमता
उसे स्थान ही कहीं ठहरने को
नहीं।
मुक्त व्योम में उड़ते-उड़ते डाल से,
कातर अलस पपीहा की वह ध्वनि
कभी
निकल-निकल कर भूल या कि अनजान में,
लगती हैं खोजनें किसी को प्रेम से।
क्लान्त तारकागण की मद्यप-
मंडली
नेत्र निमीलन करती हैं फिर
खोलती।
रिक्त चपक-सा चन्द्र लुढ़ककर हैं गिरा,
रजनी के आपानक का अब अंत हैं।
रजनी के रंजक उपकरण बिखर गये,
घूँघट खोल उषा में झाँका और फिर
अरुण अपांगों से देखा, कुछ हँस पड़ी,
लगी टहलने प्राची के प्रांगण में
तभी ॥

हरिवंशराय बच्चन.....

आज मुझसे बोल, बादल!
तम भरा तू, तम भरा मैं,
ग़म भरा तू, ग़म भरा मैं,
आज तू अपने हृदय से हृदय मेरा तोल, बादल
आज मुझसे बोल, बादल!
आग तुझमें, आग मुझमें,
राग तुझमें, राग मुझमें,
आ मिलें हम आज अपने द्वार उर के खोल, बादल
आज मुझसे बोल, बादल!
भेद यह मत देख दो पल-
क्षार जल मैं, तू मधुर जल,
व्यर्थ मेरे अश्रु, तेरी बूंद है अनमोल, बादल
आज मुझसे बोल, बादल!

दुष्यंत कुमार....

दिन भर वर्षा हुई
कल न उजाला दिखा
अकेला रहा
तुम्हें ताकता अपलक |
आती रही याद :
इंद्रधनुषों की वे सतरंगी छवियाँ
खिंची रहीं जो
मानस-पट पर भरसक |
कलम हाथ में लेकर
बूँदों से बचने की चेष्टा की--
इधर-उधर को भागा
भींग गया पर मस्तक :
हाय ! भाग्य की रेखा,
मुझ पर ही आकाश अकारण बरसा
पर तुम...
बूँदें गई न शायद तुम तक |

अयोध्यासिंह उपाध्याय
'हरिऔध'....

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे
बढ़ी,
सोचने फिर-फिर यही जी में
लगी
हाय क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी।
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में,
चू पड़ूँगी या कमल के फूल में।
बह गई उस काल एक ऐसी हवा
वो समन्दर ओर आई अनमनी,
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
वो उसी में जा गिरी मोती
बनी।
लोग यों ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर,
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।

भारतेंदु
हरिश्चंद्र......

बरषा सिर पर आ गई हरी हुई सब भूमि
बागों में झूले पड़े, रहे भ्रमण-गण झूमि
करके याद कुटुंब की फिरे विदेशी
लोग
बिछड़े प्रीतमवालियों के सिर पर छाया सोग
खोल-खोल छाता चले लोग सड़क के बीच
कीचड़ में जूते फँसे जैसे अघ में नीच।

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